पंजाब में किसानों की जमीन और रियल एस्टेट परियोजनाओं से जुड़े एक कथित बड़े घोटाले पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई ने राज्य के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। ग्रेटर मोहाली एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (GMADA) और चेंज ऑफ लैंड यूज (CLU) से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ईडी द्वारा की गई कार्रवाई को पंजाब के रियल एस्टेट सेक्टर पर अब तक की सबसे बड़ी जांचों में से एक माना जा रहा है।
जांच एजेंसी ने इंडियन कोऑपरेटिव हाउस बिल्डिंग सोसायटी से जुड़े एक पदाधिकारी को गिरफ्तार किया है। यह कार्रवाई किसानों द्वारा दर्ज कराई गई शिकायतों और एफआईआर के आधार पर की गई, जिनमें आरोप लगाया गया था कि उनकी जमीन को कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों और अवैध मंजूरियों के जरिए रियल एस्टेट परियोजनाओं में शामिल किया गया।
ईडी की प्रारंभिक जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, उन्होंने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। जांच एजेंसी के अनुसार कई किसानों की जमीन के लिए कथित तौर पर फर्जी सहमति पत्र तैयार किए गए। आरोप है कि आधिकारिक दस्तावेजों में किसानों के नकली हस्ताक्षर और अंगूठों के निशान लगाकर सरकारी विभागों से चेंज ऑफ लैंड यूज की मंजूरी हासिल की गई। इन्हीं मंजूरियों के आधार पर बड़े आवासीय और व्यावसायिक प्रोजेक्ट विकसित किए गए।
सूत्रों के अनुसार लगभग 30 एकड़ से अधिक जमीन इस विवाद के दायरे में बताई जा रही है। किसानों का आरोप है कि उन्हें या तो पूरी जानकारी नहीं दी गई या उनकी सहमति के बिना उनकी जमीन को परियोजनाओं में शामिल कर लिया गया। इस खुलासे के बाद पंजाब में भूमि अधिग्रहण, रियल एस्टेट अनुमतियों और सरकारी निगरानी प्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
इससे पहले ईडी ने कई ठिकानों पर छापेमारी भी की थी। जांच के दौरान वित्तीय दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड और नकद लेनदेन से जुड़े सबूत जुटाए गए। छापेमारी के दौरान एक नाटकीय घटनाक्रम भी सामने आया, जब जांच से घबराकर एक कारोबारी द्वारा कथित तौर पर बड़ी मात्रा में नकदी को बालकनी से नीचे फेंकने की बात सामने आई। जांच एजेंसी ने बाद में उस नकदी को जब्त कर लिया।
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि क्या रियल एस्टेट परियोजनाओं में नियामक मंजूरी मिलने से पहले ही खरीदारों से बड़ी रकम वसूली गई। जांच में यह भी देखा जा रहा है कि क्या संबंधित प्रोजेक्ट्स को रेरा (RERA) की औपचारिक मंजूरी से पहले बाजार में बेच दिया गया था। यदि ऐसा साबित होता है तो इससे न केवल निवेशकों बल्कि घर खरीदने वाले लोगों के हित भी प्रभावित हो सकते हैं।
ईडी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए निर्धारित नियमों के उल्लंघन की भी जांच कर रही है। आरोप हैं कि जिन भूखंडों और सुविधाओं को गरीब और कमजोर वर्गों के लिए आरक्षित किया जाना था, उन्हें नियमानुसार संबंधित प्राधिकरण को हस्तांतरित नहीं किया गया।
जांच अब केवल रियल एस्टेट कंपनियों तक सीमित नहीं रह गई है। एजेंसी यह भी पता लगाने में जुटी है कि क्या कुछ अधिकारियों ने नियमों के बावजूद डेवलपर्स को लाभ पहुंचाने के लिए कार्रवाई को कमजोर किया या अनदेखी की। सूत्रों के अनुसार वित्तीय लेनदेन और मंजूरी प्रक्रियाओं की भी जांच की जा रही है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कहीं रिश्वतखोरी या मिलीभगत का मामला तो नहीं था।
पंजाब में तेजी से बढ़ते शहरीकरण और रियल एस्टेट विस्तार के बीच यह मामला बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। मोहाली और आसपास के क्षेत्रों में पिछले कुछ वर्षों में कृषि भूमि को बड़े पैमाने पर आवासीय और व्यावसायिक परियोजनाओं में बदला गया है। लेकिन इसके साथ ही जमीन अधिग्रहण, दस्तावेजी गड़बड़ियों और कथित फर्जी मंजूरियों को लेकर विवाद भी लगातार सामने आते रहे हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला केवल एक वित्तीय अपराध नहीं बल्कि किसानों के अधिकारों, प्रशासनिक पारदर्शिता और रियल एस्टेट नियमन से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन सकता है। किसान संगठनों ने ईडी की कार्रवाई का स्वागत करते हुए मांग की है कि राज्य में पिछले वर्षों में मंजूर हुई अन्य परियोजनाओं की भी निष्पक्ष जांच करवाई जाए।
फिलहाल यह मामला पंजाब की सबसे चर्चित जांचों में शामिल हो चुका है। जमीन, पैसा, सरकारी मंजूरियां और कथित प्रशासनिक मिलीभगत जैसे कई गंभीर आरोपों के बीच अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि आने वाले दिनों में जांच एजेंसियां और कौन-कौन से खुलासे करती हैं।
