अमृतसर ( कुमार सोनी ) भाई जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन, मानवाधिकारों के लिए उनके संघर्ष, पुलिस द्वारा उनके कथित अपहरण एवं हत्या तथा 1980 के दशक के बाद सिख युवाओं पर हुए अत्याचारों को दर्शाने वाली फिल्म ‘सतलुज’ पर लगाए गए प्रतिबंध को हटाने की मांग को लेकर आज शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने श्री दरबार साहिब के घंटाघर प्लाजा से डिप्टी कमिश्नर कार्यालय तक रोष मार्च निकाला व पंजाब के राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा। रोष मार्च में एसजीपीसी अध्यक्ष एडवोकेट हरजिंदर सिंह धामी सहित शिरोमणि कमेटी के सदस्य, अधिकारी और कर्मचारी शामिल हुए प्रदर्शनकारियों ने हाथों में तख्तियां और बैनर लेकर शहीद भाई जसवंत सिंह खालड़ा तथा उस दौर में सिखों पर हुए अत्याचारों के लिए न्याय की मांग की।
मीडिया से बातचीत करते हुए एडवोकेट हरजिंदर सिंह धामी ने कहा कि भाई जसवंत सिंह खालड़ा की शहादत सत्य और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए दी गई अद्वितीय कुर्बानी है। उन्होंने उस दौर में, जब पंजाब में भय और आतंक का माहौल था, लापता सिख युवाओं की जानकारी जुटाने का साहसिक कार्य किया। उन्होंने विभिन्न श्मशान घाटों और नगर परिषदों से ऐसे रिकॉर्ड एकत्र किए, जिनमें अज्ञात बताकर अंतिम संस्कार किए गए युवाओं का विवरण दर्ज था। उन्होंने कहा कि यह कार्य केवल किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए सत्य को सामने लाने का ऐतिहासिक प्रयास था।
धामी ने कहा कि भाई खालड़ा के इन प्रयासों को दबाने के लिए पुलिस ने उनका अपहरण किया और अमानवीय यातनाएं देने के बाद उनकी हत्या कर दी। उन्होंने कहा कि तत्कालीन एसजीपीसी अध्यक्ष जत्थेदार गुरचरण सिंह टोहड़ा द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को भेजे गए टेलीग्राम तथा परिवार के संघर्ष के कारण इस मामले का सच सामने आया।
उन्होंने कहा कि भाई खालड़ा के जीवन, मानवाधिकारों के लिए उनके संघर्ष तथा सिख युवाओं के साथ हुई ज्यादतियों पर आधारित फिल्म ‘सतलुज’ को रिलीज होने के कुछ समय बाद ही प्रतिबंधित कर देना गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने कहा कि उस दौर में अनेक वकीलों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और उनके परिवारों ने भी बड़ी कुर्बानियां दीं। उन्होंने कहा कि वह स्वयं भी उस समय के गवाह हैं, क्योंकि बतौर वकील उन्होंने सिख युवाओं के मामलों की पैरवी की थी। उन्होंने कहा कि वह समय सिखों पर अत्याचारों का चरम था, लेकिन आज तक उन्हें न्याय नहीं मिला।
एसजीपीसी अध्यक्ष ने कहा कि भाई जसवंत सिंह खालड़ा मामले में सजा काट रहे पुलिस अधिकारी के प्रति सरकार द्वारा बरती जा रही नरमी भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है। उन्होंने कहा कि अपनी सजा से अधिक समय जेलों में बिता चुके सिख बंदियों के मामलों पर विचार तक नहीं किया जा रहा, जबकि सिख युवाओं की हत्या के दोषी पुलिस अधिकारियों की सजा माफ कराने के प्रयास किए जा रहे हैं।
उन्होंने भाई बलवंत सिंह राजोआणा, भाई जगतार सिंह हवारा सहित अन्य बंदी सिखों का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार ने हमेशा सिख भावनाओं से जुड़े मामलों की उपेक्षा की है। उन्होंने कहा कि भाई जगतार सिंह हवारा द्वारा अपनी वृद्ध माता से मिलने के लिए मांगी गई पैरोल पर भी अब तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है। यह सिखों के प्रति सरकारों के पक्षपातपूर्ण रवैये को दर्शाता है।
एडवोकेट धामी ने श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार के निर्देशानुसार 14 जुलाई को सतलुज नदी के किनारे आयोजित होने वाले शहीद स्मृति अरदास समागम में बड़ी संख्या में संगत से पहुंचने की अपील की। उन्होंने फिल्म ‘सतलुज’ पर लगा प्रतिबंध तुरंत हटाकर इसे दोबारा रिलीज करने की मांग की, ताकि नई पीढ़ी पंजाब के इतिहास की कड़वी सच्चाइयों से परिचित हो सके।
इस अवसर पर शिरोमणि कमेटी के पदाधिकारियों, सदस्यों और अधिकारियों ने फिल्म ‘सतलुज’ से प्रतिबंध हटाने तथा सिख युवाओं के साथ हुई कथित ज्यादतियों के मामलों में न्याय दिलाने की मांग को लेकर पंजाब के राज्यपाल के नाम का ज्ञापन अमृतसर की अतिरिक्त उपायुक्त पल्लवी मिश्रा को सौंपा।
