शिमला । भारत के तेजी से बढ़ते नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज करते हुए एसजेवीएन ने बिहार के जमुई जिले में 75 मेगावाट क्षमता वाली जमुई सौर विद्युत परियोजना की वाणिज्यिक परिचालन तिथि हासिल कर ली है। यह परियोजना न केवल बिहार की स्वच्छ ऊर्जा क्षमता को मजबूत करेगी, बल्कि देश के दीर्घकालिक ऊर्जा संक्रमण, कार्बन उत्सर्जन में कमी और हरित विकास के व्यापक लक्ष्य में भी योगदान देगी।
एसजेवीएन के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक भूपेंद्र गुप्ता के अनुसार, परियोजना का क्रियान्वयन कंपनी की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक इकाई एसजेवीएन ग्रीन एनर्जी लिमिटेड ने किया है। जमुई परियोजना एसजेवीएन की पारंपरिक जलविद्युत पहचान से आगे बढ़कर एक व्यापक नवीकरणीय ऊर्जा कंपनी के रूप में विकसित होने की रणनीति को भी रेखांकित करती है।
लगभग 342 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से विकसित यह सौर परियोजना जमुई जिले के हधादिया और ककनचौर गांवों के निकट करीब 300 एकड़ भूमि पर स्थापित की गई है। परियोजना से उत्पादित बिजली बिहार को उपलब्ध कराई जाएगी। इसके लिए 2.96 रुपये प्रति यूनिट का टैरिफ निर्धारित किया गया है, जिससे राज्य को अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी दर पर स्वच्छ और हरित बिजली उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।
परियोजना के पहले वर्ष में करीब 90 मिलियन यूनिट बिजली उत्पादन का अनुमान है। 25 वर्षों के संचालन काल में इसका कुल उत्पादन लगभग 3,522 मिलियन यूनिट तक पहुंच सकता है। इस तरह जमुई सौर परियोजना को केवल एक विद्युत उत्पादन इकाई के तौर पर नहीं, बल्कि लंबे समय तक राज्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाले हरित बुनियादी ढांचे के रूप में देखा जा सकता है।
इस परियोजना का महत्व उस समय और बढ़ जाता है जब भारत अपनी ऊर्जा व्यवस्था को धीरे-धीरे कम कार्बन वाली अर्थव्यवस्था की ओर ले जाने का प्रयास कर रहा है। सरकार ने 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। ऐसे में देश के विभिन्न हिस्सों में सौर, पवन और अन्य स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं की स्थापना इस व्यापक राष्ट्रीय लक्ष्य को जमीन पर उतारने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
एसजेवीएन के अनुसार, जमुई परियोजना के संचालन से अनुमानित तौर पर लगभग 82,250.74 टन कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी। यह आंकड़ा इस परियोजना के पर्यावरणीय महत्व को स्पष्ट करता है। कोयला और अन्य जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली पर निर्भरता को कम करने के साथ ऐसी परियोजनाएं ऊर्जा उत्पादन और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाने में मदद कर सकती हैं।
जमुई परियोजना का प्रभाव ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं है। इसके निर्माण और संचालन से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा हुए हैं। परियोजना से करीब 15 से 20 प्रत्यक्ष तथा 50 से 100 अप्रत्यक्ष रोजगार अवसर सृजित होने की जानकारी कंपनी ने दी है। ग्रामीण और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए इस तरह के अवसर महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि बड़े ऊर्जा निवेशों का वास्तविक सामाजिक प्रभाव तभी व्यापक होता है जब स्थानीय समुदाय भी उससे आर्थिक रूप से जुड़ता है।
परियोजना बिहार सरकार की बिहार नवीकरणीय ऊर्जा विकास एजेंसी द्वारा जारी निविदा के आधार पर विकसित की गई है। इसका सफल वाणिज्यिक संचालन राज्य में नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार की संभावनाओं को भी मजबूत करता है। बिहार जैसे राज्य के लिए, जहां ऊर्जा की बढ़ती मांग के साथ विकास की गति तेज हो रही है, स्थानीय स्तर पर स्वच्छ ऊर्जा क्षमता का विस्तार भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है।
एसजेवीएन के निदेशक मंडल के विभिन्न अधिकारियों ने परियोजना को कंपनी की नवीकरणीय ऊर्जा यात्रा में महत्वपूर्ण पड़ाव बताया है। कंपनी का जोर अब केवल विद्युत उत्पादन बढ़ाने पर नहीं, बल्कि ऊर्जा क्षेत्र में ऐसी परियोजनाओं का विस्तार करने पर है जो आर्थिक विकास, पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा सुरक्षा—तीनों उद्देश्यों को साथ लेकर चल सकें।
जमुई सौर परियोजना की शुरुआत इसी व्यापक बदलाव की एक मिसाल है। भारत की ऊर्जा जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं और आने वाले वर्षों में बिजली की मांग को पूरा करने के साथ-साथ उत्सर्जन कम करना भी उतनी ही बड़ी चुनौती होगी। ऐसे में नई सौर परियोजनाएं देश के ऊर्जा ढांचे में बदलाव की आधारशिला बन सकती हैं।
एसजेवीएन के लिए भी जमुई परियोजना का वाणिज्यिक संचालन एक रणनीतिक संकेत है। कंपनी देश के विभिन्न हिस्सों में अपने नवीकरणीय ऊर्जा पोर्टफोलियो का विस्तार कर रही है और स्वयं को भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के रूप में स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
जमुई की 75 मेगावाट परियोजना इसलिए महज एक नई बिजली परियोजना नहीं है। यह उस राष्ट्रीय यात्रा का हिस्सा है जिसमें ऊर्जा उत्पादन को विकास, रोजगार और पर्यावरणीय स्थिरता के साथ जोड़ा जा रहा है। बिहार में पैदा होने वाली यह हरित बिजली आने वाले वर्षों में भारत के उस बड़े संकल्प की एक छोटी लेकिन महत्वपूर्ण कड़ी होगी, जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ स्वच्छ, सुरक्षित और टिकाऊ ऊर्जा भविष्य का निर्माण लक्ष्य है।
