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चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर पर किसानों का डेरा: MSP, कर्जमाफी और पंजाब के पानी समेत इन मांगों को लेकर धरना

पंजाब के किसान एक बार फिर अपनी लंबित मांगों को लेकर सड़कों पर हैं। संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) के आह्वान पर किसानों ने चंडीगढ़-मोहाली सीमा के पास सात दिवसीय धरना शुरू किया है। किसान 1 से 7 सितंबर तक मोहाली की ओर गोल्फ क्लब के नजदीक IISER-जगतपुरा रोड पर डटे रहेंगे। बड़ी संख्या में किसान ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ यहां पहुंचे हैं और कई किसान अपने साथ राशन, बर्तन, गैस सिलेंडर, मोटरसाइकिल तथा रोजमर्रा की जरूरत का सामान भी लेकर आए हैं। इससे साफ है कि किसान इसे महज कुछ घंटों के प्रदर्शन के बजाय लगातार चलने वाले मोर्चे के रूप में देख रहे हैं।

किसानों के इस आंदोलन के केंद्र में सबसे प्रमुख मांग न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP की कानूनी गारंटी है। किसान संगठनों का कहना है कि विभिन्न फसलों के लिए MSP घोषित किए जाने के बावजूद किसानों को हर बार यह सुनिश्चित नहीं होता कि उन्हें वास्तव में उस कीमत पर अपनी उपज बेचने का अवसर मिलेगा। उनका कहना है कि MSP को कानूनी अधिकार बनाया जाना चाहिए, ताकि बाजार में कीमत गिरने की स्थिति में भी किसान को घोषित न्यूनतम मूल्य से कम पर अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर न होना पड़े।

पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्य में MSP का सवाल विशेष महत्व रखता है। यहां बड़ी संख्या में किसान गेहूं और धान की खरीद व्यवस्था पर निर्भर हैं। किसानों का तर्क है कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि खेती से होने वाली आय पर दबाव बना हुआ है। ऐसे में केवल MSP घोषित करना पर्याप्त नहीं है; खरीद और मूल्य की प्रभावी गारंटी भी जरूरी है।

किसानों की दूसरी बड़ी मांग किसानों और खेत मजदूरों की कर्जमाफी से जुड़ी है। किसान संगठनों का कहना है कि कृषि लागत, कर्ज और आय के बीच असंतुलन ने ग्रामीण परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ाया है। उनका मानना है कि छोटे और सीमांत किसानों तथा खेत मजदूरों के लिए व्यापक कर्ज राहत की जरूरत है।

किसानों ने पंजाब के पानी से जुड़े मुद्दे को भी अपने आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है। पंजाब में नदी जल और उससे जुड़े अधिकार लंबे समय से संवेदनशील विषय रहे हैं। किसान संगठन राज्य के नदी जल से संबंधित पुराने समझौतों और पंजाब के हितों से जुड़े फैसलों पर पुनर्विचार की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि पानी केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि पंजाब की खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़ा प्रश्न है।

भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड में पंजाब के प्रतिनिधित्व का मुद्दा भी किसानों की मांगों में शामिल है। किसान संगठनों का कहना है कि पंजाब से संबंधित जल एवं सिंचाई व्यवस्था से जुड़े संस्थानों में राज्य के हितों और प्रतिनिधित्व को पर्याप्त महत्व मिलना चाहिए।

किसानों की मांगों की सूची यहीं समाप्त नहीं होती। वे पहले के किसान आंदोलनों के दौरान दर्ज किए गए मामलों को वापस लेने, आंदोलन के दौरान प्रभावित किसानों को लंबित मुआवजा देने और फसल बीमा व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने की मांग भी कर रहे हैं। भूमि अधिग्रहण से जुड़े मुद्दे भी उनके एजेंडे में शामिल हैं।

किसान संगठन अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ प्रस्तावित या संभावित मुक्त व्यापार समझौतों को लेकर भी चिंतित हैं। उनका तर्क है कि यदि कृषि उत्पादों का आयात बढ़ता है तो भारतीय किसानों को अंतरराष्ट्रीय कीमतों के दबाव का सामना करना पड़ सकता है। पंजाब के किसान संगठनों को आशंका है कि इससे पहले से दबाव झेल रही कृषि आय पर और असर पड़ सकता है।

इस आंदोलन की एक महत्वपूर्ण मांग पंजाब विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की भी है, खासकर राज्य के पानी से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के लिए। किसानों का मानना है कि पंजाब से जुड़े महत्वपूर्ण कृषि और जल संबंधी प्रश्नों पर राज्य की विधानसभा में विस्तृत राजनीतिक चर्चा होनी चाहिए।

धरने के लिए किसानों का चंडीगढ़-मोहाली सीमा को चुनना भी महत्वपूर्ण है। यह इलाका पंजाब की प्रशासनिक और राजनीतिक गतिविधियों के बेहद करीब है। किसान चाहते हैं कि सरकार तक उनकी आवाज सीधे पहुंचे और उनकी लंबित मांगों पर बातचीत हो।

प्रदर्शन के कारण प्रशासन को यातायात व्यवस्था में भी बदलाव करना पड़ा है। पुलिस ने सीमा क्षेत्र में बैरिकेडिंग की है और वाहनों की आवाजाही को नियंत्रित किया जा रहा है। किसानों की ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की मौजूदगी के कारण आसपास के मार्गों पर यातायात प्रभावित हुआ है। हालांकि किसान संगठनों का मुख्य उद्देश्य अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचाना है, लेकिन बड़ी संख्या में वाहनों के पहुंचने से स्थानीय यातायात पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।

किसानों का कहना है कि उनका आंदोलन किसी एक फसल या किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है। वे MSP, कर्ज, पानी, फसल बीमा, मुआवजा और कृषि नीति जैसे उन मुद्दों को उठा रहे हैं जिनका सीधा संबंध पंजाब के ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति से है।

पंजाब में खेती केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं बल्कि राज्य की सामाजिक और ग्रामीण व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। इसलिए किसानों की मांगों का असर खेतों से बाहर भी दिखाई देता है। MSP में बदलाव, कृषि लागत, पानी की उपलब्धता और किसानों का कर्ज ग्रामीण दुकानदारों, मजदूरों, आढ़तियों और छोटे कारोबारियों तक को प्रभावित करता है।

फिलहाल संयुक्त किसान मोर्चा का यह धरना 7 सितंबर तक चलने का कार्यक्रम है। किसान संगठनों की कोशिश है कि इस अवधि में सरकार उनकी मांगों पर गंभीरता से बातचीत करे और लंबित मुद्दों के समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए।

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