पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 से करीब डेढ़ साल पहले कांग्रेस ने राज्य संगठन को लेकर बड़ा फैसला लिया है। पार्टी हाईकमान ने वरिष्ठ नेता और पूर्व राजस्थान उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट को पंजाब कांग्रेस का नया AICC महासचिव प्रभारी नियुक्त किया है। पायलट अब भूपेश बघेल की जगह पंजाब का प्रभार संभालेंगे। बघेल को पंजाब से हटाकर असम का प्रभारी बनाया गया है। कांग्रेस के संगठनात्मक फेरबदल की घोषणा शनिवार को AICC महासचिव संगठन के.सी. वेणुगोपाल की ओर से की गई।
यह बदलाव महज नियमित संगठनात्मक नियुक्ति के तौर पर देखना मुश्किल है। पंजाब में कांग्रेस पिछले कुछ समय से लगातार अंदरूनी खींचतान, नेतृत्व को लेकर असहमति और अलग-अलग नेताओं के गुटों के बीच टकराव से जूझ रही है। ऐसे समय में सचिन पायलट को जिम्मेदारी सौंपना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि कांग्रेस हाईकमान 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पंजाब इकाई को नए तरीके से व्यवस्थित करने और पार्टी को एक चुनावी मशीन में बदलने की कोशिश कर रहा है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह बदलाव ऐसे समय हुआ है जब पंजाब कांग्रेस के भीतर मतभेद सार्वजनिक मंचों तक पहुंच चुके हैं। अगस्त में लुधियाना में पार्टी की संगठनात्मक बैठक के दौरान कार्यकर्ताओं के एक वर्ग ने भूपेश बघेल के खिलाफ नारे लगाए थे और ‘बघेल वापस जाओ’ जैसे नारे सुनाई दिए थे। यह बैठक कांग्रेस के ‘हर बूथ, कांग्रेस मजबूत’ अभियान का हिस्सा थी, जिसका उद्देश्य 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करना था।
बघेल के दौर में क्या हुआ?
भूपेश बघेल को पंजाब की जिम्मेदारी ऐसे समय मिली थी जब कांग्रेस को 2027 के लिए अपने संगठन को फिर से खड़ा करना था। पार्टी के सामने एक तरफ आम आदमी पार्टी की सरकार थी, दूसरी तरफ भाजपा तेजी से अपना आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही थी और शिरोमणि अकाली दल अपने पुराने राजनीतिक आधार को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहा है।
बघेल के कार्यकाल में कांग्रेस ने संगठनात्मक स्तर पर कई प्रयोग किए। जुलाई में हाईकमान ने पंजाब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के साथ तीन कार्यकारी अध्यक्षों की व्यवस्था को मंजूरी दी थी। इस व्यवस्था में अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक समूहों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की गई थी।
लेकिन संगठनात्मक पुनर्गठन के बावजूद गुटबाजी खत्म नहीं हुई।
राजा वड़िंग के नेतृत्व को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और उनके समर्थक लगातार सवाल उठाते रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री चन्नी, सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा और अन्य नेताओं के बीच मतभेदों को लेकर पार्टी हाईकमान को बार-बार हस्तक्षेप करना पड़ा है। जुलाई में बघेल ने साफ कहा था कि हाईकमान राजा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखने का फैसला बदलने नहीं जा रहा।
लेकिन सितंबर की शुरुआत में तस्वीर बदलती दिखाई दी। राहुल गांधी की प्रस्तावित पंजाब यात्रा से पहले दिल्ली में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की बैठक हुई, जिसमें पंजाब कांग्रेस के भीतर चल रही गुटबाजी पर भी चर्चा हुई। बैठक में बघेल, राजा वड़िंग और प्रताप सिंह बाजवा शामिल हुए, जबकि चन्नी और सुखजिंदर सिंह रंधावा को अलग से बातचीत के लिए बुलाने की बात सामने आई।
और इसके तुरंत बाद पायलट की नियुक्ति सामने आ गई।
सचिन पायलट क्यों?
सचिन पायलट की नियुक्ति को कांग्रेस की पंजाब रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा सकता है।
पायलट की सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह पंजाब कांग्रेस के अलग-अलग शक्ति केंद्रों को एक मंच पर कैसे लाते हैं। पार्टी में राजा वड़िंग, प्रताप सिंह बाजवा, चरणजीत सिंह चन्नी, सुखजिंदर सिंह रंधावा और अन्य वरिष्ठ नेताओं के अपने-अपने राजनीतिक आधार और समर्थक हैं।
कांग्रेस के लिए अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि उसके पास नेता कितने हैं। सवाल यह है कि क्या ये नेता एक ही दिशा में चुनाव लड़ सकते हैं।
पायलट के सामने संभवतः पहला लक्ष्य यही होगा कि चुनाव से पहले कांग्रेस के अंदर ‘मुख्यमंत्री का चेहरा कौन?’ या ‘प्रदेश संगठन पर किसका नियंत्रण?’ जैसी लड़ाइयों को नियंत्रित किया जाए।
यह चुनौती इसलिए भी गंभीर है क्योंकि कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को पहले ही यह संदेश देना पड़ा है कि कोई भी नेता पार्टी से बड़ा नहीं है। मार्च 2026 में पंजाब दौरे के दौरान राहुल गांधी ने वरिष्ठ नेताओं को सार्वजनिक रूप से चेतावनी दी थी कि यदि वे टीम के रूप में काम नहीं करेंगे तो उन्हें संगठन में पीछे किया जा सकता है। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को कांग्रेस की वास्तविक ताकत बताते हुए नेताओं से एकजुट होकर काम करने की अपील की थी।
कांग्रेस के लिए पंजाब क्यों इतना महत्वपूर्ण है?
2022 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए बेहद खराब रहा था। 117 सदस्यीय विधानसभा में आम आदमी पार्टी ने 92 सीटें जीतकर सत्ता पर कब्जा किया, जबकि कांग्रेस सिर्फ 18 सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस का वोट शेयर लगभग 23 प्रतिशत रहा।
लेकिन इसके बाद पंजाब की राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह कांग्रेस के खिलाफ नहीं रही।
2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने पंजाब की 13 में से 7 सीटें जीतकर राज्य में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में वापसी के संकेत दिए। उसका वोट शेयर लगभग 26.3 प्रतिशत रहा। आम आदमी पार्टी को 3 सीटें मिलीं, जबकि शिरोमਣੀ ਅਕਾਲੀ ਦਲ को एक और दो सीटਾਂ निर्दलीय उम्मीदवारों के खाते में गईं।
यही प्रदर्शन कांग्रेस को 2027 के लिए उम्मीद देता है।
लेकिन पार्टी के सामने एक बड़ी समस्या है—लोकसभा की सफलता को विधानसभा की जीत में बदलना।
2024 में कांग्रेस ने सात लोकसभा सीटें जीतीं, लेकिन उसके बाद हुए विधानसभा उपचुनावों में उसका प्रदर्शन लगातार मजबूत नहीं रहा। इस विरोधाभास ने हाईकमान के सामने साफ कर दिया है कि केवल बड़े नेताओं की लोकप्रियता पर्याप्त नहीं होगी; बूथ स्तर का संगठन, उम्मीदवारों का चयन और स्थानीय चुनावी प्रबंधन निर्णायक होगा।
अब कांग्रेस का फोकस ‘हर सीट की अलग रणनीति’ पर
कांग्रेस ने पंजाब के लिए अब एक अधिक माइक्रो-मैनेजमेंट आधारित चुनावी रणनीति तैयार करने की दिशा में काम शुरू कर दिया है।
पार्टी ने विधानसभा क्षेत्रों को उनकी राजनीतिक स्थिति के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में देखने की रणनीति बनाई है—कुछ सीटों को बचाने की जरूरत है, कुछ पर कांग्रेस को वापसी की संभावना दिखाई देती है और कुछ सीटों पर संगठन को लगभग नए सिरे से खड़ा करने की जरूरत है।
हर विधानसभा क्षेत्र के लिए अलग प्रभारी, बूथ स्तर की सक्रियता और स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित अभियान की तैयारी की जा रही है। उम्मीदवारों के चयन में भी केवल वरिष्ठता के बजाय स्थानीय पकड़, सामाजिक स्वीकार्यता और संगठन के साथ काम करने की क्षमता को महत्व देने की कोशिश की जा रही है।
यह बदलाव कांग्रेस की पुरानी चुनावी शैली से काफी अलग है, जिसमें राज्यव्यापी चेहरे और बड़े चुनावी मुद्दों पर अधिक निर्भरता रहती थी।
अब पार्टी समझ रही है कि पंजाब में 2027 का मुकाबला बेहद करीबी और बहुकोणीय हो सकता है।
AAP के खिलाफ कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती
आम आदमी पार्टी पंजाब में सत्ता में है और उसके पास सरकार का पूरा संगठनात्मक ढांचा है। 2022 में पार्टी ने 92 सीटें जीतकर जिस तरह का जनादेश हासिल किया था, वह अभी भी कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
हालांकि 2024 लोकसभा चुनाव में AAP के प्रदर्शन ने कांग्रेस को यह विश्वास दिया कि राज्य में सत्ता विरोधी भावना और राजनीतिक असंतोष का लाभ उठाया जा सकता है। 2026 में भी पंजाब की राजनीति में सरकार के खिलाफ विभिन्न मुद्दों पर विपक्षी हमले तेज हुए हैं। ऐसे में कांग्रेस अब AAP को मुख्य प्रतिद्वंद्वी मानकर अपना अभियान तैयार कर रही है।
कांग्रेस की रणनीति संभवतः दोहरी होगी—एक तरफ भगवंत मान सरकार के खिलाफ शासन, कानून-व्यवस्था, रोजगार, नशे और कृषि जैसे मुद्दे उठाना और दूसरी तरफ यह संदेश देना कि कांग्रेस के पास पंजाब को स्थिर और अनुभवी शासन देने की क्षमता है।
लेकिन यहां कांग्रेस के सामने एक मुश्किल भी है। यदि उसका पूरा अभियान केवल AAP विरोध तक सीमित रहा तो वह भाजपा और अकाली दल के बढ़ते प्रभाव को नजरअंदाज कर सकती है।
भाजपा भी कांग्रेस के लिए चुनौती
पंजाब की राजनीति में भाजपा की स्थिति पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में बदली है।
2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर लगभग 6.6 प्रतिशत था, लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव में यह बढ़कर लगभग 18.6 प्रतिशत हो गया। हालांकि भाजपा एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी, लेकिन पार्टी कई विधानसभा क्षेत्रों में मजबूत स्थिति में पहुंची और 2024 में 24 विधानसभा segments में सबसे अधिक वोट हासिल करने का दावा सामने आया।
विशेष रूप से पंजाब के शहरी और हिंदू बहुल क्षेत्रों में भाजपा की बढ़ती सक्रियता कांग्रेस के पारंपरिक शहरी वोट बैंक के लिए चुनौती बन सकती है।
कंडी बेल्ट—पठानकोट, ਹੁਸ਼ਿਆਰਪੁਰ, ਨਵਾਂਸ਼ਹਿਰ और ਰੋਪੜ क्षेत्र—को कांग्रेस और भाजपा दोनों महत्वपूर्ण मान रहे हैं। कांग्रेस का उद्देश्य यहां भाजपा के विस्तार को रोकना है, जबकि भाजपा अपनी संगठनात्मक मौजूदगी को और मजबूत करने में लगी है।
इसलिए पायलट के सामने केवल AAP को चुनौती देने का काम नहीं होगा। उन्हें कांग्रेस के उस वोट बैंक को भी बचाना होगा जो भाजपा की ओर जा सकता है।
दलित वोट बैंक पर विशेष नजर
पंजाब की राजनीति में अनुसूचित जाति मतदाता बेहद महत्वपूर्ण हैं। कांग्रेस के लिए यह वर्ग परंपरागत रूप से महत्वपूर्ण रहा है, लेकिन 2022 के बाद पार्टी को इस वोट बैंक को फिर से संगठित करने की जरूरत महसूस हो रही है।
चरणजीत सिंह चन्नी लगातार दलित प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाते रहे हैं। संगठन में दलित नेताओं की पर्याप्त हिस्सेदारी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर भी पार्टी के भीतर बहस हुई है।
इसलिए कांग्रेस की नई रणनीति में SC सीटों और दलित बहुल क्षेत्रों पर विशेष फोकस की संभावना है।
साथ ही ग्रामीण जाट सिख वोट, शहरी हिंदू मतदाता, किसान, युवा, महिलाएं और पारंपरिक कांग्रेस समर्थक परिवार—इन सभी सामाजिक समूहों को अलग-अलग संदेशों के जरिए जोड़ने की कोशिश की जाएगी।
पंथक राजनीति को भी नजरअंदाज नहीं कर सकती कांग्रेस
पंजाब में 2027 का चुनाव केवल विकास बनाम सरकार का चुनाव नहीं होगा। पंथक राजनीति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
बंदी सिखों की रिहाई, अकाल तख्त, धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता, सिख पहचान और पंजाब-केंद्र संबंध जैसे मुद्दे फिर से चुनावी बहस का हिस्सा बन रहे हैं। AAP, भाजपा, कांग्रेस और अकाली दल—सभी पंथक मतदाताओं के बीच अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
कांग्रेस के लिए यह विशेष रूप से संवेदनशील क्षेत्र है। उसे एक तरफ सिख मतदाताओं के बीच अपना पारंपरिक आधार पुनर्जीवित करना है और दूसरी तरफ शहरी हिंदू मतदाताओं से भी दूरी नहीं बनने देनी है।
यही कारण है कि पायलट के लिए पंजाब केवल संगठनात्मक नियुक्ति नहीं, बल्कि बेहद जटिल सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को साधने की चुनौती है।
राहुल गांधी की पंजाब यात्रा भी अहम
सचिन पायलट की नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब राहुल गांधी की पंजाब यात्रा की तैयारियां चल रही हैं। सितंबर के दूसरे पखवाड़े में उनकी प्रस्तावित यात्रा को कांग्रेस राज्य में संगठनात्मक ऊर्जा पैदा करने के अवसर के तौर पर देख रही है।
कांग्रेस हाईकमान की कोशिश संभवतः यह होगी कि राहुल गांधी की यात्रा से पहले राज्य संगठन में प्रमुख विवादों को नियंत्रित किया जाए और सभी प्रमुख नेताओं को एक साझा राजनीतिक मंच पर लाया जाए।
पायलट के लिए यह शुरुआती परीक्षा भी होगी।
यदि वह चन्नी, वड़िंग, बाजवा, रंधावा और अन्य नेताओं को एक मंच पर लाने में सफल होते हैं, तो यह कांग्रेस के लिए बड़ा मनोवैज्ञानिक लाभ होगा।
2027 की लड़ाई में कांग्रेस का असली लक्ष्य
कांग्रेस के लिए अब लक्ष्य केवल 2022 के 18 विधायकों से संख्या बढ़ाना नहीं है। पार्टी की नजर सत्ता पर है।
2024 लोकसभा चुनाव ने कांग्रेस को दिखाया कि पंजाब में उसका पारंपरिक आधार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। 13 में से सात लोकसभा सीटों की जीत इस बात का संकेत थी कि कांग्रेस अभी भी राज्य में एक गंभीर चुनावी शक्ति है। लेकिन 2027 में उसे इस समर्थन को 117 विधानसभा क्षेत्रों में स्थानीय संगठन, उम्मीदवार और बूथ प्रबंधन के जरिए वोट में बदलना होगा।
यही कारण है कि आने वाले महीनों में कांग्रेस की राजनीति में कई और फैसले देखने को मिल सकते हैं—उम्मीदवारों की शुरुआती पहचान, विधानसभा-वार सर्वे, बूथ कमेटियों का पुनर्गठन, वरिष्ठ नेताओं को अलग-अलग क्षेत्रों की जिम्मेदारी, युवा और महिला संगठन को सक्रिय करना तथा असंतुष्ट नेताओं को साथ लाने की कोशिश।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि टिकट वितरण से पहले गुटबाजी को किस हद तक नियंत्रित किया जाता है।
पायलट के सामने सबसे कठिन सवाल
सचिन पायलट को पंजाब में तीन मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा।
पहला—संगठन को मजबूत करना।
दूसरा—वरिष्ठ नेताओं की आपसी लड़ाई खत्म करना।
तीसरा—कांग्रेस को AAP के खिलाफ वास्तविक सत्ता विकल्प के रूप में पेश करना।
अगर पार्टी इन तीनों में से किसी एक मोर्चे पर भी कमजोर रही तो 2027 का मुकाबला मुश्किल हो सकता है।
क्योंकि इस समय पंजाब में मुकाबला केवल कांग्रेस बनाम AAP नहीं है। भाजपा अपने आधार को बढ़ा रही है, अकाली दल वापसी की कोशिश कर रहा है और पंथक मुद्दे फिर राजनीतिक केंद्र में आ रहे हैं। विश्लेषणों में भी 2027 को चार-कोणीय मुकाबले की दिशा में बढ़ता चुनाव बताया जा रहा है।
बड़ा सवाल: क्या पायलट कांग्रेस को एकजुट कर पाएंगे?
भूपेश बघेल को हटाकर सचिन पायलट को पंजाब की जिम्मेदारी देना कांग्रेस हाईकमान का स्पष्ट संदेश है कि 2027 की लड़ाई को हल्के में नहीं लिया जा रहा।
कांग्रेस ने पिछले चुनावों से यह सबक लिया है कि केवल सरकार विरोधी माहौल सत्ता तक पहुंचने के लिए पर्याप्त नहीं होता। संगठन मजबूत होना चाहिए, स्थानीय नेतृत्व एकजुट होना चाहिए और उम्मीदवारों का चयन समय रहते होना चाहिए।
पायलट के सामने इसलिए सबसे पहला चुनावी लक्ष्य कोई रैली या बड़ा नारा नहीं, बल्कि पंजाब कांग्रेस के भीतर विश्वास बहाली होगा।
यदि वह यह करने में सफल होते हैं, तो कांग्रेस 2027 में AAP के लिए सबसे गंभीर चुनौती बन सकती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सात सीटों की जीत ने पार्टी को वह आधार पहले ही दे दिया है, जिस पर विधानसभा की लड़ाई खड़ी की जा सकती है। लेकिन यदि गुटबाजी जारी रहती है और नेता अपने-अपने राजनीतिक हितों को पार्टी के सामूहिक लक्ष्य से ऊपर रखते हैं, तो 2024 की लोकसभा सफलता भी 2027 में सत्ता की गारंटी नहीं बनेगी।
इसलिए सचिन पायलट की पंजाब में नियुक्ति को सबसे बेहतर तरीके से एक ‘रीसेट’ के तौर पर देखा जा सकता है—ऐसा रीसेट जिसके पीछे कांग्रेस का लक्ष्य स्पष्ट है: संगठन को बूथ तक मजबूत करना, नेताओं को एक मंच पर लाना, पारंपरिक वोट बैंक को वापस जोड़ना और 2027 में भगवंत मान की AAP सरकार को सत्ता से हटाने के लिए पूरी ताकत झोंकना।
और आने वाले महीनों में कांग्रेस के फैसले यह बताएंगे कि यह केवल संगठनात्मक फेरबदल है या वास्तव में पंजाब में सत्ता वापसी के लिए शुरू किया गया एक सुनियोजित अभियान।