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किसानों का सरकार पर नया दबाव: मंत्रियों के घरों के बाहर धरने से पंजाब में सियासी गर्मी तेज

— पंजाब में विधानसभा चुनाव से पहले ग्रामीण और किसान राजनीति एक बार फिर आम आदमी पार्टी सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनती दिखाई दे रही है। किसान मजदूर मोर्चा ने अपनी मांगों को लेकर सोमवार से राज्य के मंत्रियों और विधानसभा अध्यक्ष के आवासों के बाहर धरने शुरू कर दिए हैं। यह आंदोलन ऐसे समय में शुरू हुआ है जब भगवंत मान सरकार को खेती, बिजली, खाद, किसानों की देनदारियों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर लगातार राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है।

मोर्चे की ओर से राज्य के कई मंत्रियों के आवासों को आंदोलन का केंद्र बनाया गया है। अमृतसर में पीडब्ल्यूडी मंत्री हरभजन सिंह ईटीओ के आवास के पास प्रदर्शन के लिए स्थान तैयार करने की तस्वीरें सामने आई हैं, जहां किसानों ने ट्रैक्टर और मशीनरी की मदद से मैदान को समतल किया। इससे संकेत मिलता है कि संगठन इस बार आंदोलन को केवल प्रतीकात्मक विरोध तक सीमित रखने के बजाय जमीनी स्तर पर लंबा दबाव बनाने की तैयारी में है।

किसान मजदूर मोर्चा ने बिजली और खाद की उपलब्धता से लेकर फसलों की सरकारी खरीद तक कई मुद्दों को आंदोलन के केंद्र में रखा है। उसकी प्रमुख मांगों में धान के मौजूदा सीजन के लिए पर्याप्त बिजली और खाद की व्यवस्था, बासमती, मक्का, मूंग, सरसों और आलू जैसी फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद, किसानों की कर्जमाफी तथा कृषि क्षेत्र से जुड़े अन्य आर्थिक मुद्दे शामिल हैं। मोर्चा बाढ़ से होने वाले नुकसान की स्थायी रोकथाम, गिरते भूजल स्तर, जमीन अधिग्रहण और लैंड पूलिंग नीति जैसे सवाल भी उठा रहा है।

इस आंदोलन का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि पंजाब में खेती केवल आर्थिक गतिविधि नहीं बल्कि राज्य की ग्रामीण राजनीति का आधार है। किसानों की नाराजगी का असर गांवों की सामाजिक और राजनीतिक धारणाओं पर पड़ता है और यही कारण है कि चुनावी वर्षों में किसान संगठनों का आंदोलन किसी भी सरकार के लिए महज कानून-व्यवस्था का विषय नहीं रहता।

भगवंत मान सरकार के लिए मौजूदा चुनौती का एक दूसरा पहलू यह है कि किसानों के साथ बातचीत और आश्वासन के बावजूद कई मुद्दे बार-बार आंदोलन का रूप ले रहे हैं। सितंबर के पहले सप्ताह में भी किसान संगठनों ने चंडीगढ़-मोहाली सीमा पर करीब एक सप्ताह तक प्रदर्शन किया था, जिसके बाद सरकार की ओर से कई मुद्दों पर लिखित आश्वासन दिए जाने पर आंदोलन वापस लिया गया। इनमें किसानों के कर्ज, गन्ने के लंबित भुगतान, बीज संबंधी कानून और अन्य पंजाब-केंद्रित मुद्दे शामिल थे।

ऐसे में नया आंदोलन सरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी है। किसान संगठनों का ताजा रुख यह संकेत देता है कि केवल बातचीत या आश्वासन अब पर्याप्त नहीं माने जा रहे हैं। संगठनों की मांग है कि सरकार ठोस निर्णय लेकर उन्हें लागू करने की दिशा में आगे बढ़े।

मोर्चे ने 16 सितंबर को आंदोलन की अगली रणनीति तय करने की चेतावनी दी है। यदि तब तक सरकार की ओर से प्रभावी पहल नहीं होती है तो आंदोलन को और व्यापक किए जाने की संभावना है। किसान संगठनों ने पहले भी सड़क और रेल मार्गों को प्रभावित करने वाले विरोध प्रदर्शनों का सहारा लिया है, इसलिए सरकार के सामने चुनौती केवल मंत्रियों के आवासों तक सीमित आंदोलन को संभालने की नहीं, बल्कि इसके विस्तार को रोकने की भी है।

राजनीतिक रूप से देखें तो यह आंदोलन आम आदमी पार्टी के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2027 का विधानसभा चुनाव अब बहुत दूर नहीं है। सरकार के सामने जहां अपने विकास और कल्याणकारी योजनाओं के रिकॉर्ड को जनता के बीच ले जाने की चुनौती है, वहीं विपक्ष लगातार शासन-व्यवस्था, कानून-व्यवस्था, किसानों की समस्याओं, ग्रामीण रोजगार और आर्थिक दबाव को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है।

किसान आंदोलन इस राजनीतिक मुकाबले को और जटिल बना सकता है। पंजाब में 2020-21 के किसान आंदोलन के बाद ग्रामीण मतदाताओं की राजनीतिक भूमिका पहले से कहीं अधिक निर्णायक हुई है। आगामी चुनाव में आम आदमी पार्टी को ग्रामीण पंजाब में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए केवल सरकारी योजनाओं का हवाला देना पर्याप्त नहीं होगा; उसे यह भी साबित करना होगा कि किसानों और खेत मजदूरों से जुड़े लंबित सवालों पर उसकी सरकार निर्णय लेने और उन्हें जमीन पर लागू करने में सक्षम है।

इस बीच विपक्षी दलों के लिए भी किसान आंदोलन राजनीतिक अवसर बन सकता है। कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और भाजपा सहित विभिन्न दल पहले से ही सरकार को अलग-अलग मुद्दों पर घेर रहे हैं। ऐसे में किसान संगठनों का असंतोष विपक्षी राजनीति को अतिरिक्त धार दे सकता है, हालांकि किसान संगठनों की अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान और विभिन्न दलों से दूरी का इतिहास भी रहा है।

आम आदमी पार्टी सरकार के सामने अब सबसे बड़ी परीक्षा आंदोलन को टकराव में बदलने से रोकने और किसानों के साथ संवाद को ठोस परिणाम में बदलने की है। यदि सरकार समय रहते बिजली, खाद, खरीद, कर्ज और अन्य प्रमुख मांगों पर स्पष्ट रोडमैप देती है तो स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन यदि आंदोलन 16 सितंबर के बाद और व्यापक होता है, तो यह आगामी चुनाव से पहले पंजाब में शासन और ग्रामीण असंतोष के सवाल को एक बड़े राजनीतिक मुद्दे में बदल सकता है।

किसानों के घरों से निकलकर मंत्रियों के घरों तक पहुंचा यह आंदोलन इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह सरकार को सीधे उसके राजनीतिक नेतृत्व के सामने जवाबदेही की चुनौती दे रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भगवंत मान सरकार बातचीत के रास्ते से इस दबाव को कम करती है या किसान संगठनों का आंदोलन चुनावी राजनीति के बीच एक बड़े ग्रामीण जनआंदोलन का रूप लेता है।

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