पंजाब के सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों के लंबित महंगाई भत्ते (DA/DR) के भुगतान को लेकर चल रहे विवाद में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाते हुए पंजाब के मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर को होगी। मंगलवार की सुनवाई में अदालत ने लंबित बकाये के भुगतान से जुड़े अपने पहले के निर्देशों के अनुपालन को लेकर सरकार से जवाब मांगा और मुख्य सचिव की व्यक्तिगत उपस्थिति तय की।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब पंजाब सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच DA को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। सरकार ने हाल में कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए 8 प्रतिशत DA बढ़ाने की घोषणा की है, लेकिन यह वृद्धि उन पुराने बकायों से अलग है जिनको लेकर हाईकोर्ट में मामला चल रहा है। सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच सितंबर में हुई बातचीत के बाद 8 प्रतिशत की वृद्धि को दो चरणों में लागू करने की बात सामने आई थी। इसका लाभ सितंबर के वेतन के साथ मिलने की बात कही गई थी।
मंगलवार की सुनवाई का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि हाईकोर्ट पहले ही पंजाब सरकार को कर्मचारियों और पेंशनरों के लंबित DA/DR की किस्तों के भुगतान को लेकर स्पष्ट निर्देश दे चुका है। अगस्त में डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार और पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (PSPCL) की अपीलों को खारिज करते हुए लंबित DA/DR को केंद्र सरकार के अनुरूप दरों पर जारी करने का निर्देश दिया था। अदालत ने भुगतान के लिए समयसीमा भी निर्धारित की थी और मुख्य सचिव को आदेश के अनुपालन की जिम्मेदारी सौंपी थी।
हाईकोर्ट के उस आदेश में लंबित राशि का आंकड़ा लगभग 14,191 करोड़ रुपये बताया गया था। अदालत ने यह भी कहा था कि यदि निर्धारित समय में भुगतान नहीं किया जाता है तो बकाया राशि पर 6 प्रतिशत सालाना साधारण ब्याज का प्रावधान लागू होगा। अदालत ने राज्य सरकार को अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का भी निर्देश दिया था।
इससे पहले सरकार की ओर से वित्तीय बोझ का तर्क दिया गया था। राज्य का कहना रहा है कि एक साथ इतनी बड़ी राशि जारी करने से पहले ही वित्तीय दबाव झेल रहे पंजाब के खजाने पर भारी असर पड़ेगा। सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख भी किया है। दूसरी ओर, कर्मचारी संगठनों का तर्क रहा है कि DA कर्मचारियों का अर्जित वित्तीय अधिकार है और राज्य सरकार लंबे समय तक इसका भुगतान रोक नहीं सकती।
अदालत ने अपने पिछले फैसले में इस तर्क को स्वीकार नहीं किया था कि राज्य की वित्तीय कठिनाइयां कर्मचारियों और पेंशनरों के बकाये को रोकने का आधार बन सकती हैं। अदालत ने यह भी सवाल उठाया था कि जब पंजाब में कार्यरत अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को केंद्र की दरों के अनुरूप DA दिया जा रहा है, तो अन्य सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों के साथ अलग व्यवहार किस आधार पर किया जा सकता है। अदालत ने इसे समानता के संवैधानिक सिद्धांत से जोड़ते हुए राज्य की दलीलों पर गंभीर सवाल उठाए थे।
DA विवाद पिछले कई महीनों में पंजाब सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच बड़े टकराव का कारण बन चुका है। कर्मचारी संगठनों ने लंबित DA की किस्तें जारी करने के अलावा पुरानी पेंशन योजना, कच्चे कर्मचारियों को नियमित करने और अन्य सेवा संबंधी मांगों को लेकर भी आंदोलन किया है। अगस्त में बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारियों ने सामूहिक अवकाश लेकर राज्यव्यापी आंदोलन किया था। कर्मचारी संगठनों ने बाद में सरकार पर दबाव बढ़ाने के लिए मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ भी विरोध कार्यक्रमों की घोषणा की थी।

सरकार और कर्मचारियों के बीच सितंबर में बातचीत के बाद हालांकि DA की दर में 8 प्रतिशत की वृद्धि पर सहमति बनी। मुख्यमंत्री भगवंत मान की मौजूदगी में कर्मचारी और पेंशनर संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक हुई, जिसके बाद सरकार ने लगभग आठ लाख कर्मचारियों और पेंशनरों को लाभ पहुंचने वाली इस वृद्धि की घोषणा की। लेकिन कर्मचारी संगठनों के लिए पुराना बकाया अभी भी बड़ा मुद्दा बना हुआ है।
यही अंतर इस पूरे विवाद को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। हाल में घोषित 8 प्रतिशत DA वृद्धि भविष्य के भुगतान की दर में वृद्धि से संबंधित है, जबकि हाईकोर्ट में लंबित मामला उन किस्तों और बकाये से जुड़ा है जो कर्मचारियों और पेंशनरों के अनुसार पहले से देय हैं। इसलिए नई DA वृद्धि को पुराने बकाये के पूर्ण भुगतान के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
इस विवाद का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू राज्य की वित्तीय स्थिति है। कर्मचारी संगठनों ने हाल में दावा किया है कि पंजाब की कर आय में पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और सरकार के पास DA बकाया चुकाने की क्षमता है। उन्होंने राज्य की बढ़ी हुई GST, आबकारी, स्टांप ड्यूटी और अन्य राजस्व प्राप्तियों का हवाला दिया है। सरकार की ओर से दूसरी तरफ यह तर्क दिया गया है कि बेहतर राजस्व संग्रह का अर्थ यह नहीं है कि राज्य के पास अपने सभी वित्तीय दायित्वों को एक साथ पूरा करने के लिए पर्याप्त मुक्त संसाधन उपलब्ध हैं। वेतन, पेंशन, ऋण सेवा और अन्य प्रतिबद्ध खर्च भी राज्य के बजट पर दबाव डालते हैं।
हाईकोर्ट ने पहले के आदेश में सरकार के बड़े विज्ञापन खर्च पर भी रोक से संबंधित निर्देश दिए थे, जब तक कर्मचारियों और पेंशनरों के बकाये का भुगतान नहीं हो जाता। अदालत का तर्क था कि कर्मचारियों के वैधानिक वित्तीय लाभों के भुगतान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
अगली सुनवाई 5 अक्टूबर को अब विशेष महत्व रखती है क्योंकि मुख्य सचिव की व्यक्तिगत उपस्थिति में सरकार को अदालत के सामने यह स्पष्ट करना होगा कि पिछले निर्देशों के अनुपालन की स्थिति क्या है और लंबित DA/DR के भुगतान को लेकर उसकी वर्तमान स्थिति क्या है। अदालत यह भी देख सकती है कि सरकार द्वारा उठाए गए कानूनी और प्रशासनिक कदम उसके पूर्व निर्देशों के अनुरूप हैं या नहीं।
पंजाब के लाखों सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए यह मामला केवल महंगाई भत्ते की अतिरिक्त राशि का नहीं, बल्कि लंबे समय से लंबित वित्तीय अधिकारों और सरकार की भुगतान क्षमता से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। दूसरी ओर, सरकार के सामने अदालत के निर्देशों, कर्मचारी संगठनों के दबाव और राज्य की वित्तीय सीमाओं के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है।
5 अक्टूबर की सुनवाई इसलिए इस लंबे विवाद में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव होगी। मुख्य सचिव की व्यक्तिगत उपस्थिति और सरकार की अनुपालन स्थिति पर हाईकोर्ट की प्रतिक्रिया से यह संकेत मिल सकता है कि पुराने DA/DR बकाये के भुगतान को लेकर आगे की कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया किस दिशा में जाएगी।