जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारी अगर ईमानदारी से काम न करें, तो समाज को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है
सरकार और प्रशासन से आम जनता की सबसे बड़ी अपेक्षा यही होती है कि विकास के लिए जारी किया गया हर रुपया ज़मीन पर दिखे। लेकिन जब जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारी ही अपने कर्तव्यों का निर्वहन सही ढंग से न करें और भ्रष्टाचार या लापरवाही में लिप्त पाए जाएं, तो यह न केवल व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है, बल्कि समाज के विश्वास को भी गहरी चोट पहुंचाता है।
इसी चिंता को उजागर करता है अमृतसर से सामने आया ताजा मामला, जिसमें पंजाब सरकार ने अमृतसर के एसएसपी विजिलेंस लखबीर सिंह को सस्पेंड कर दिया है। यह कार्रवाई एक सीनियर आईएएस अधिकारी द्वारा की गई शिकायत के बाद की गई। मामला अमृतसर के रंजीत एवेन्यू क्षेत्र में करीब 55 करोड़ रुपये की लागत से स्वीकृत विकास कार्यों से जुड़ा है।
जानकारी के अनुसार, इन विकास परियोजनाओं के लिए करोड़ों रुपये जारी किए गए थे, जिनमें सड़कों, नालियों, इंफ्रास्ट्रक्चर और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़े काम शामिल थे। लेकिन जब इन कार्यों की जमीनी स्थिति की जांच की गई, तो कई चौंकाने वाली खामियां सामने आईं। कहीं काम अधूरा मिला, कहीं घटिया सामग्री का इस्तेमाल हुआ और कई स्थानों पर तो काम शुरू होने के कोई स्पष्ट प्रमाण तक नहीं मिले, जबकि भुगतान बड़े पैमाने पर किया जा चुका था।
स्थानीय लोगों की शिकायतों के बाद इस पूरे मामले की इंटरनल जांच कराई गई। जांच के दौरान वित्तीय अनियमितताओं और प्रक्रियागत लापरवाही के गंभीर संकेत मिले। जांच एक सीनियर आईएएस अधिकारी की निगरानी में की गई, जिसमें तत्कालीन एसएसपी विजिलेंस लखबीर सिंह की भूमिका पर सवाल उठे। आरोप है कि उन्होंने फंड के सही उपयोग और विकास कार्यों की प्रभावी निगरानी नहीं की, जो उनके पद और जिम्मेदारी के विपरीत है।
जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद पंजाब सरकार ने सख्त रुख अपनाते हुए लखबीर सिंह को निलंबित कर दिया। उनके अलावा एक समाजसेवी सहित कुल पांच अन्य लोगों के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की गई है। हालांकि, फिलहाल इस एफआईआर के विवरण को सार्वजनिक नहीं किया गया है। अब यह जांच का विषय है कि 55 करोड़ रुपये की पूरी राशि कहां खर्च हुई, किसे इसका लाभ मिला और इस पूरे तंत्र में और कौन-कौन लोग शामिल थे।
गौर करने वाली बात यह भी है कि लखबीर सिंह को इसी वर्ष मार्च में अमृतसर में विजिलेंस विभाग का एसएसपी नियुक्त किया गया था और 25 जून 2025 को चर्चित अकाली नेता विक्रम मजीठिया की गिरफ्तारी करने वाली टीम का नेतृत्व भी उन्होंने ही किया था। ऐसे में उनका निलंबन कई सवाल खड़े करता है और यह संदेश भी देता है कि सरकार अब भ्रष्टाचार और लापरवाही के मामलों में किसी भी स्तर पर समझौता नहीं करना चाहती।
यह मामला एक बार फिर इस सच्चाई को सामने लाता है कि अगर जवाबदेही तय न हो और निगरानी तंत्र कमजोर रहे, तो विकास के नाम पर जारी धन जनता तक पहुंचने से पहले ही रास्ते में गायब हो जाता है। समाज के हित में जरूरी है कि जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ काम करें, ताकि विकास केवल कागजों तक सीमित न रह जाए, बल्कि लोगों की जिंदगी में वास्तविक बदलाव ला सके।
