हिमाचल प्रदेश विधानसभा में विधायकों की सैलरी और भत्तों में 24% की बढ़ोतरी को लेकर सत्ता और विपक्ष में पूरी एकजुटता देखने को मिली। नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने भी इस बढ़ोतरी का समर्थन करते हुए कहा कि विधायकों के वेतन में वृद्धि जरूरी थी। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब राज्य की जनता की समस्याओं की बात आती है, तब ऐसी एकता क्यों नहीं दिखती? यह लोकतंत्र का एक बड़ा विरोधाभास है कि जब विधायकों के भत्तों और सुविधाओं की बात आती है, तो सभी दल एक साथ खड़े हो जाते हैं, लेकिन आम जनता से जुड़े मुद्दों पर यह एकता नदारद रहती है।
हिमाचल प्रदेश विधानसभा में तीन महत्वपूर्ण संशोधन विधेयकों को पारित कर मुख्यमंत्री, मंत्रियों, स्पीकर, डिप्टी स्पीकर और विधायकों के वेतन और भत्तों में 24% की बढ़ोतरी की गई। इस वृद्धि को मूल्य सूचकांक से जोड़ा गया है, जिससे हर पांच साल में स्वचालित रूप से वेतन में वृद्धि होगी। यह वृद्धि नौ साल के अंतराल के बाद की गई है, पिछली बार 2016 में वेतन संशोधन किया गया था।
राज्य सरकार पर इस वेतन वृद्धि से सालाना लगभग 24 करोड़ रुपये का वित्तीय बोझ पड़ेगा। पूर्व विधायकों की पेंशन में भी वृद्धि की गई है। इस वेतन वृद्धि पर लगभग 20 से 22 करोड़ रुपये का खर्च आएगा, स्पीकर और डिप्टी स्पीकर के वेतन में बढ़ोतरी से सालाना 35 लाख रुपये का अतिरिक्त भार पड़ेगा, जबकि मंत्रियों के वेतन और भत्तों में हुई वृद्धि से सालाना लगभग 2 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च होगा।
इस प्रस्तावित वेतन वृद्धि से संबंधित तीन विधेयक— ‘हिमाचल प्रदेश विधान सभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष वेतन (संशोधन) विधेयक 2025’, ‘हिमाचल प्रदेश विधान सभा (भत्ते और पेंशन) संशोधन विधेयक 2025’ और ‘मंत्रियों के वेतन और भत्ते (हिमाचल प्रदेश) संशोधन विधेयक 2025’ पारित किए गए।
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि यह विधेयक विधायकों को स्वच्छ राजनीति की दिशा में प्रेरित करने के लिए लाया गया है, जिससे उनका वेतन अन्य वर्गों के समान हो सके। उन्होंने यह भी बताया कि विधायकों को पहले मिलने वाले 20,000 रुपये के टेलीफोन भत्ते को समाप्त कर दिया गया है, और उनके लिए दी जाने वाली पानी और बिजली की सब्सिडी भी हटा ली गई है।
महामारी के दौरान, मंत्रियों को मिलने वाला 30% आतिथ्य भत्ता एक साल के लिए कम कर दिया गया था, जिसकी अवधि 1 अप्रैल 2020 से शुरू हुई थी। अब वेतन में बढ़ोतरी के बाद मुख्यमंत्री का वेतन 95,000 रुपये से बढ़ाकर 1.15 लाख रुपये कर दिया गया है, स्पीकर का वेतन 80,000 रुपये से 95,000 रुपये, डिप्टी स्पीकर का वेतन 75,000 रुपये से 92,000 रुपये, कैबिनेट मंत्रियों का वेतन 80,000 रुपये से 95,000 रुपये, राज्य मंत्रियों का वेतन 78,000 रुपये से 93,000 रुपये, उप-मंत्रियों का वेतन 75,000 रुपये से 80,000 रुपये और विधायकों का वेतन 55,000 रुपये से बढ़ाकर 70,000 रुपये कर दिया गया है।
इस वेतन वृद्धि के समर्थन में कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों के विधायकों ने मेजें थपथपाकर अपनी सहमति जताई। विपक्ष के नेता जयराम ठाकुर, मंत्री चंद्र कुमार, हर्षवर्धन चौहान, जगत सिंह नेगी, विधायक हंसराज, संजय रतन, राकेश कालिया, आईडी गांधी और विनोद कुमार ने विधायकों के वेतन में वृद्धि को जायज ठहराया और कहा कि अन्य वर्गों की तरह उन्हें भी समय-समय पर वेतन वृद्धि मिलनी चाहिए।
लेकिन सवाल यह उठता है कि जब प्रदेश में बेरोजगारी, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली, सड़क निर्माण, बिजली कटौती जैसी समस्याओं पर चर्चा करनी होती है, तब यह एकता कहां चली जाती है? जब बात विधायकों के फायदे की हो, तो सरकार और विपक्ष सब कुछ भुलाकर एक सुर में बोलते हैं, लेकिन आम जनता की तकलीफों पर कोई गंभीरता नहीं दिखती। यही लोकतंत्र का असली चेहरा है, जहां जनता हमेशा सरकार के फैसलों का खामियाजा उठाती है।
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