लोकतंत्र के नाम पर अराजकता: जब चुनी हुई सत्ता ही जनता के अधिकारों की सबसे बड़ी चुनौती बन जाए

प्रवीण सोनी

लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा इस विश्वास पर टिकी होती है कि जनता द्वारा चुनी गई सरकार समाज और अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगी, समान अवसर देगी और संविधान के दायरे में रहकर शासन करेगी। चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं होते, बल्कि यह जनता की उम्मीदों, आकांक्षाओं और भविष्य की दिशा तय करने का लोकतांत्रिक अधिकार होते हैं। लेकिन जब यही चुनी हुई सत्ता जनता की सेवा के बजाय सत्ता के दुरुपयोग में लग जाए, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे एक खोखले ढांचे में बदलने लगता है।

अक्सर देखा गया है कि सत्ता में आते ही कुछ सरकारें खुद को जनता के प्रति जवाबदेह मानने के बजाय मालिक समझने लगती हैं। लोकतंत्र में मिली ताकत को वे सेवा का माध्यम नहीं, बल्कि नियंत्रण और दमन का औजार बना लेती हैं। नीतियां आम नागरिकों के हित में नहीं, बल्कि कुछ गिने-चुने लोगों, करीबी समर्थकों और उन बड़े कारोबारी समूहों के लिए बनने लगती हैं, जिन्होंने चुनाव के समय राजनीतिक दलों को आर्थिक या अन्य प्रकार का समर्थन दिया होता है। इस तरह लोकतंत्र धीरे-धीरे ‘जनता का, जनता के लिए’ की भावना से दूर होकर ‘चंद लोगों के फायदे’ का माध्यम बन जाता है।

जब सत्ता और पूंजी का गठजोड़ मजबूत होता है, तब सबसे पहले चोट सामाजिक और आर्थिक न्याय पर पड़ती है। संसाधनों का असमान बंटवारा शुरू होता है। प्राकृतिक संसाधन, सरकारी ठेके, बड़े प्रोजेक्ट और नीतिगत छूट उन्हीं लोगों को मिलती है जो सत्ता के करीब होते हैं। आम नागरिक के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और न्याय जैसे बुनियादी मुद्दे हाशिए पर चले जाते हैं। विकास का दावा तो किया जाता है, लेकिन उसका लाभ नीचे तक नहीं पहुंचता। इससे समाज में असंतोष और अविश्वास पनपने लगता है।

ऐसी स्थिति में जब जनता सवाल उठाने लगती है, तो लोकतांत्रिक संवाद की जगह दमन का रास्ता चुना जाता है। शांतिपूर्ण विरोध को कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बताकर कुचला जाता है। पुलिस और प्रशासन, जो लोकतंत्र में नागरिकों की सुरक्षा के लिए होते हैं, उन्हें सत्ता की ढाल बना दिया जाता है। असहमति को देशद्रोह या अराजकता करार देकर दबाने की कोशिश होती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित कर दी जाती है, मीडिया पर दबाव बढ़ता है और सच बोलने वाली आवाजें धीरे-धीरे खामोश कर दी जाती हैं।

लोकतंत्र का सबसे गंभीर क्षरण तब होता है जब चुनावी प्रक्रिया ही संदिग्ध बनने लगे। जब सत्ता में बैठे लोग हार के डर से निष्पक्ष चुनाव से घबराने लगें, तब चुनावों में धांधली, वोटों की खरीद-फरोख्त और डर का माहौल पैदा किया जाता है। लोकतंत्र में जहां मतदान अधिकार होता है, वहां इसे सत्ता का अधिकार समझ लिया जाता है। धीरे-धीरे यह भावना पनपती है कि सत्ता में बने रहना ही सबसे बड़ा लक्ष्य है, चाहे उसके लिए किसी भी हद तक क्यों न जाना पड़े।

इस पूरी प्रक्रिया में संस्थाएं कमजोर होती जाती हैं। न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के बीच संतुलन लोकतंत्र की रीढ़ होता है, लेकिन जब सारी शक्ति एक ही केंद्र में सिमटने लगे, तो यह संतुलन टूट जाता है। अदालतों पर दबाव, जांच एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल और प्रशासनिक संस्थाओं का पक्षपात लोकतंत्र को भीतर से खोखला कर देता है। कानून सबके लिए समान रहने के बजाय चुनिंदा लोगों के लिए ढाल और बाकी के लिए हथियार बन जाता है।

इतिहास और समकालीन अनुभव बताते हैं कि जब कोई नेतृत्व लंबे समय तक सत्ता में रहता है और खुद को अपराजेय समझने लगता है, तो वह धीरे-धीरे जनता से कटने लगता है। उसे आलोचना असहनीय लगने लगती है और वह खुद को राज्य, राष्ट्र और कानून से ऊपर मानने लगता है। यही वह बिंदु होता है जहां लोकतंत्र का स्वरूप बदलकर तानाशाही या अराजकता की ओर बढ़ने लगता है। बाहर से भले ही लोकतांत्रिक ढांचा दिखे, लेकिन भीतर से वह खोखला हो चुका होता है।

ऐसी व्यवस्थाओं में सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक को होता है। बेरोजगारी, महंगाई, असमानता और असुरक्षा बढ़ती है। युवा भविष्य को लेकर निराश होने लगते हैं, किसान और मजदूर हाशिए पर चले जाते हैं, और मध्यम वर्ग लगातार दबाव में रहता है। जब जनता का भरोसा टूटता है, तो समाज में अस्थिरता और अशांति का माहौल बनता है। यह स्थिति न केवल उस देश के लिए, बल्कि पूरे क्षेत्र और दुनिया के लिए चिंता का विषय बन जाती है।

यह लेख किसी देश, सरकार या व्यक्ति की ओर इशारा नहीं करता, बल्कि एक चेतावनी है। यह उन सभी के लिए एक बड़ा अलर्ट है जो लोकतंत्र में सत्ता पाकर उसे निजी जागीर समझने लगते हैं। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है, बल्कि हर दिन जनता के प्रति जवाबदेह रहने की जिम्मेदारी है। सत्ता अस्थायी होती है, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाएं और जनता का विश्वास स्थायी होना चाहिए।

अगर लोकतंत्र को बचाना है, तो सत्ता में बैठे लोगों को यह समझना होगा कि ताकत का दुरुपयोग अंततः व्यवस्था को ही कमजोर करता है। जनता को दबाकर, चुनावों को प्रभावित कर और संस्थाओं को नियंत्रित करके कोई भी शासन लंबे समय तक स्थिर नहीं रह सकता। सच्चा लोकतंत्र वही है जहां सत्ता जनता से डरती है, न कि जनता सत्ता से। यही चेतावनी, यही संदेश और यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी सीख है।