लाहौर के ऐतिहासिक एचिसन गुरुद्वारा साहिब में 80 वर्षों बाद गूंजे शबद कीर्तन और अरदास, सिख विरासत के पुनर्जागरण का भावुक क्षण

लाहौर के मॉल रोड स्थित प्रतिष्ठित एचिसन कॉलेज परिसर में बने पुरातन गुरुद्वारा साहिब में करीब आठ दशकों के अंतराल के बाद सिख अरदास और शबद कीर्तन का आयोजन हुआ। शुक्रवार, 13 फरवरी को आयोजित यह कार्यक्रम न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भ में भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लंबे समय से मौन पड़े इस पवित्र स्थल पर गुरबाणी की गूंज ने विभाजन-पूर्व पंजाब की साझा विरासत और सिख इतिहास की स्मृतियों को एक बार फिर जीवंत कर दिया।

इस विशेष अवसर पर पाकिस्तान के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सरदार रमेश सिंह अरोड़ा, स्थानीय सिख संगत, बुद्धिजीवी वर्ग और अन्य गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे। कार्यक्रम का आयोजन डॉ. तरुणजीत सिंह बुतालिया द्वारा एचिसन कॉलेज प्रशासन के सहयोग से किया गया। उन्होंने बताया कि स्थानीय रागी जत्थे के हरविंदर सिंह, अक्षयदीप सिंह और दलीप सिंह ने गुरबाणी के पवित्र शबदों का भावपूर्ण कीर्तन कर संगत को आध्यात्मिक अनुभूति से भर दिया।

डॉ. बुतालिया ने जानकारी दी कि वर्ष 1947 के विभाजन के बाद सिख विद्यार्थियों की संख्या शून्य हो जाने के कारण यह गुरुद्वारा साहिब नियमित धार्मिक गतिविधियों से वंचित हो गया था। हालांकि, कॉलेज प्रशासन द्वारा इसकी संरचना और पवित्रता की देखरेख निरंतर की जाती रही। यह ऐतिहासिक शबद कीर्तन एचिसन कॉलेज की 140वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया, जिसने इस आयोजन को और भी विशेष बना दिया।

गौरतलब है कि एचिसन कॉलेज की स्थापना 3 नवंबर 1886 को अविभाजित पंजाब के शाही और प्रतिष्ठित परिवारों को उच्च शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी। अभिलेखों के अनुसार, कॉलेज परिसर में स्थित गुरुद्वारा साहिब का वास्तुशिल्प तत्कालीन मेयो स्कूल ऑफ आर्ट्स (वर्तमान नेशनल कॉलेज ऑफ आर्ट्स) के प्रसिद्ध सिख वास्तुकार सरदार राम सिंह द्वारा तैयार किया गया था, जो उस दौर की सिख स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।

डॉ. बुतालिया के अनुसार, गुरुद्वारा साहिब की आधारशिला वर्ष 1910 में पटियाला रियासत के महाराजा भूपिंदर सिंह ने रखी थी। महाराजा स्वयं 1904 से 1908 तक एचिसन कॉलेज के छात्र रहे थे। इसके बाद दो वर्षों में गुरुद्वारा भवन का निर्माण पूर्ण हुआ और इसे एक सक्रिय प्रार्थना स्थल के रूप में समर्पित किया गया, जहां सिख विद्यार्थी प्रतिदिन संध्या कालीन अरदास में भाग लिया करते थे।

वर्तमान समय में एचिसन कॉलेज के लगभग 15 सिख पूर्व छात्र भारत में निवास कर रहे हैं। उनसे हुई बातचीत में उन्होंने गुरुद्वारा साहिब की काले और सफेद संगमरमर की फर्श, किले जैसी भव्य आंतरिक संरचना और वहां बिताए अपने छात्र जीवन के दिनों को भावुक होकर याद किया। यह स्मृतियां इस बात का प्रमाण हैं कि यह गुरुद्वारा केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सिख समुदाय की शैक्षणिक और सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

उल्लेखनीय है कि एचिसन कॉलेज परिसर में गुरुद्वारा साहिब के साथ-साथ विभाजन-पूर्व काल की एक मस्जिद और एक हिंदू मंदिर भी आज तक मौजूद हैं, जो पंजाब की साझा सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक सह-अस्तित्व और ऐतिहासिक सौहार्द का जीवंत प्रतीक माने जाते हैं। 80 वर्षों बाद आयोजित यह शबद कीर्तन न केवल सिख समुदाय के लिए एक भावनात्मक क्षण रहा, बल्कि भारत और पाकिस्तान के बीच बंटी विरासत को जोड़ने वाली एक आध्यात्मिक कड़ी के रूप में भी देखा जा रहा है।