नामोल के जग्गा सिंह के आरोपों की जांच जारी; पुलिस ने बताया नौ FIR और चार मामलों में सजा, कांग्रेस ने AAP सरकार से पूछे सवाल
संगरूर : पंजाब के संगरूर जिले में नशे के कथित कारोबार के खिलाफ आवाज उठाने वाले नामोल गांव के जग्गा सिंह द्वारा जिला प्रशासनिक परिसर के बाहर जहरीला पदार्थ निगलने की घटना ने राज्य में नशे के मुद्दे पर एक बार फिर राजनीतिक और प्रशासनिक बहस तेज कर दी है।
जग्गा सिंह ने कथित तौर पर आरोप लगाया था कि उनके गांव में नशीले पदार्थों की बिक्री हो रही है और शिकायतों के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि नशे के खिलाफ वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करने के बाद उन्हें धमकियों और दबाव का सामना करना पड़ा। घटना के बाद उन्हें पहले संगरूर के सरकारी अस्पताल ले जाया गया और बाद में हालत को देखते हुए पटियाला के राजिंदरा अस्पताल रेफर किया गया।
हालांकि, घटना की परिस्थितियों और जग्गा सिंह द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। पुलिस की जांच जारी है और प्रशासन की ओर से मामले के सभी पहलुओं को सामने लाने की प्रक्रिया चल रही है।
DC कार्यालय के बाहर क्या हुआ?
रिपोर्टों के अनुसार, घटना रविवार शाम जिला प्रशासनिक परिसर में हुई। जग्गा सिंह, जो सुनाम क्षेत्र के नामोल गांव के रहने वाले हैं, ने वहां कथित रूप से जहरीला पदार्थ निगल लिया।
मीडिया रिपोर्टों में उनके मित्र मंजिंदर सिंह के हवाले से कहा गया है कि जग्गा ने गांव में कथित रूप से ‘चिट्टा’ बेचने वालों के संबंध में वीडियो बनाए थे। इसके बाद उन्होंने धमकियों और कथित हमले की शिकायत की थी। जग्गा के एक वीडियो में भी कथित तौर पर गांव में नशे की उपलब्धता को लेकर चिंता जताई गई थी।
जग्गा को तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया। डॉक्टरों ने प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें पटियाला के राजिंदरा अस्पताल भेज दिया। उपलब्ध नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार उनका इलाज चल रहा है। जहरीले पदार्थ की प्रकृति को लेकर शुरुआती रिपोर्टों में अलग-अलग जानकारी सामने आई है, इसलिए इसकी निश्चित पहचान को लेकर आधिकारिक चिकित्सा रिपोर्ट का इंतजार जरूरी है।

पुलिस ने सामने रखा जग्गा का पुराना रिकॉर्ड
इस घटना के बाद पंजाब पुलिस और AAP ने जग्गा सिंह के आपराधिक रिकॉर्ड को सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनाया है।
संगरूर पुलिस के अनुसार जग्गा के खिलाफ वर्ष 2018 से अब तक कुल नौ FIR दर्ज हैं और इनमें से चार मामलों में अदालत उन्हें दोषी ठहरा चुकी है। पुलिस ने बताया कि मामलों में NDPS और आबकारी कानून से जुड़े मामले भी शामिल हैं। एक अन्य गंभीर आपराधिक मामला भी उनके खिलाफ दर्ज होने की बात पुलिस ने कही है।
AAP नेताओं ने इसी रिकॉर्ड के आधार पर विपक्ष पर जग्गा सिंह को नशे के खिलाफ लड़ने वाला व्यक्ति बताकर राजनीतिक मुद्दा बनाने का आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि नामोल गांव में दो पंचायतों, गुरुद्वारा कमेटियों, किसान संगठनों और ग्रामीणों ने कथित नशा बिक्री के खिलाफ सामूहिक रुख अपनाया है।
लेकिन पुलिस रिकॉर्ड में किसी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज मामले अपने आप में उस व्यक्ति द्वारा लगाए गए मौजूदा आरोपों को सही या गलत साबित नहीं करते। इसी तरह, जग्गा सिंह के नशे की बिक्री और धमकियों से जुड़े आरोपों की जांच का निष्कर्ष भी अभी सामने नहीं आया है।
यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है—एक तरफ व्यक्ति के खिलाफ पुलिस द्वारा बताए गए पुराने आपराधिक मामलों का रिकॉर्ड है, और दूसरी तरफ गांव में नशे की कथित बिक्री तथा शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होने के उनके आरोप। दोनों सवालों की अलग-अलग जांच जरूरी है।
सचिन पायलट सहित विपक्ष ने सरकार को घेरा
घटना ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। कांग्रेस के पंजाब प्रभारी सचिन पायलट ने जग्गा सिंह की घटना को लेकर भगवंत मान सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि पंजाब में नशे के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों पर दबाव बनाया जा रहा है और इस घटना को सरकार की नशा नीति के संदर्भ में गंभीर सवाल के रूप में देखा जाना चाहिए।
कांग्रेस के अन्य नेताओं ने भी सरकार से जवाब मांगा है। भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के नेताओं ने भी घटना को नशे के मुद्दे पर AAP सरकार के दावों से जोड़कर सवाल उठाए हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि यदि लोग नशे के कारोबार के खिलाफ शिकायत करने के बाद खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं तो सरकार की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
AAP ने इन आरोपों को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है और विपक्ष से जग्गा सिंह के आरोपों के साथ-साथ उनके आपराधिक रिकॉर्ड और नामोल गांव में स्थानीय स्तर पर नशे के खिलाफ लिए गए कथित सामूहिक रुख को भी देखने को कहा है।
यह घटना उस समय हुई जब संगरूर पहले से सवालों के घेरे में है
जग्गा सिंह का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि संगरूर जिले में नशे के मुद्दे को लेकर कुछ ही दिनों में यह दूसरी बड़ी घटना है।
इससे पहले दिरबा क्षेत्र के गुलजार सिंह की जहरीला पदार्थ निगलने के बाद मौत हो गई थी। गुलजार सिंह ने कथित तौर पर एक सार्वजनिक कार्यक्रम में पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा के सामने अपने क्षेत्र में नशे की समस्या और अपने बेटे के ‘चिट्टा’ की लत का मुद्दा उठाया था। उनके परिवार ने आरोप लगाया कि इसके बाद उन पर माफी मांगने का दबाव बनाया गया और उन्हें परेशान किया गया। इन आरोपों के आधार पर पुलिस ने एक सरपंच और चार अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था; हरपाल सिंह चीमा को उस FIR में आरोपी नहीं बनाया गया था।
इस मामले को राष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान मिला। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने 8 सितंबर को पंजाब सरकार को नोटिस जारी कर गुलजार सिंह की मौत के संबंध में विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भी 16 सितंबर को गुलजार सिंह की मौत के मामले में पंजाब सरकार से विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट मांगी थी।
इसी मामले को लेकर 15 सितंबर को कांग्रेस नेताओं ने चंडीगढ़ में प्रदर्शन किया था, जिसमें सचिन पायलट, प्रताप सिंह बाजवा और अन्य नेताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया था।
ऐसे में जग्गा सिंह की घटना ने संगरूर के नशे से जुड़े विवाद को और व्यापक बना दिया है।
नशामुक्त पंजाब के दावे पर बढ़ता राजनीतिक दबाव
भगवंत मान सरकार ने पंजाब में नशे के खिलाफ बड़े अभियान चलाए हैं और नशा तस्करी के खिलाफ पुलिस कार्रवाई को अपनी प्रमुख प्राथमिकताओं में रखा है। लेकिन संगरूर की हालिया घटनाओं ने सरकार के सामने एक अलग सवाल खड़ा किया है—क्या केवल नशा तस्करों के खिलाफ कार्रवाई पर्याप्त है, या उन ग्रामीणों की शिकायतों पर भी उतनी ही तेजी से कार्रवाई हो रही है जो अपने गांवों में नशे की बिक्री की जानकारी प्रशासन तक पहुंचाते हैं?
यह सवाल फिलहाल राजनीतिक आरोपों से आगे जाकर प्रशासनिक जांच का विषय है।
जग्गा सिंह के मामले में यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा कि उन्होंने किस अधिकारी या संस्था को कब शिकायत दी, उनकी शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई, गांव में पुलिस ने क्या जांच की, कथित वीडियो की क्या स्थिति थी और उनके द्वारा लगाए गए धमकी या हमले के आरोपों के संबंध में क्या रिकॉर्ड उपलब्ध है।
इसी तरह यह भी जांच का विषय है कि घटना से पहले उनके और पंचायत के बीच वास्तव में क्या विवाद हुआ था। AAP नेता अमन अरोड़ा ने दावा किया है कि 7 सितंबर को जग्गा और पंचायत के बीच विवाद हुआ था और दोनों पक्षों ने चीमा थाने में शिकायतें दी थीं। उनके अनुसार मामले की जांच चल रही है।
सवाल अब सिर्फ राजनीति का नहीं
संगरूर की इन घटनाओं ने पंजाब में नशे की समस्या को एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। लेकिन इस बहस के बीच सबसे जरूरी सवाल उन लोगों की सुरक्षा और शिकायतों की निष्पक्ष जांच का है जो नशे के खिलाफ आवाज उठाने का दावा करते हैं।
जग्गा सिंह के मामले में पुलिस के पास एक तरफ उनका पुराना आपराधिक रिकॉर्ड है, जबकि दूसरी तरफ उनके द्वारा लगाए गए आरोप हैं। किसी एक पक्ष को जांच पूरी होने से पहले अंतिम सत्य मानना मामले की वास्तविकता को समझने में बाधा बन सकता है।
इसलिए अब निगाह पुलिस जांच, चिकित्सा रिपोर्ट और प्रशासनिक कार्रवाई पर है।
अगर गांव में वास्तव में नशीले पदार्थों की बिक्री की शिकायतें की गई थीं, तो यह पता लगाना प्रशासन की जिम्मेदारी है कि उन शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई। और अगर जग्गा सिंह द्वारा लगाए गए धमकी, हमले या पुलिस निष्क्रियता के आरोप तथ्यहीन पाए जाते हैं, तो जांच से वह भी स्पष्ट होना चाहिए।
संगरूर में हाल की घटनाओं ने कम से कम इतना स्पष्ट कर दिया है कि पंजाब का नशा संकट केवल आंकड़ों, राजनीतिक बयानों या चुनावी भाषणों का विषय नहीं है। इसके केंद्र में ऐसे परिवार और गांव हैं जिनकी जिंदगी पर इसका सीधा असर पड़ता है।
जग्गा सिंह की घटना ने इसी बहस को फिर सामने ला दिया है—और इस बार सवाल यह भी है कि नशे के खिलाफ आवाज उठाने वाले नागरिक और प्रशासन के बीच भरोसा कैसे कायम किया जाए।
इसका जवाब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, पारदर्शी कार्रवाई और जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों से ही सामने आएगा।



