बरसीम (ट्राइफोलियम अलेक्जेंड्रिनम) उत्तर भारत के किसानों और पशुपालकों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। खासतौर पर हिमाचल प्रदेश, पंजाब और हरियाणा में यह चारा फसल बड़े पैमाने पर उगाई जाती है, क्योंकि यह न केवल दुधारू पशुओं के लिए पोषण का बेहतरीन स्रोत है, बल्कि इसके सेवन से उनकी दूध देने की क्षमता भी बढ़ जाती है। यह एक अत्यधिक पौष्टिक, मुलायम और रसीला हरा चारा है, जिसे पशु आसानी से पचा सकते हैं और इससे उनके स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। भारत में विशेष रूप से दुधारू पशुओं के लिए चारे की कमी एक बड़ी समस्या रही है, लेकिन बरसीम की खेती इस समस्या का एक प्रभावी समाधान साबित हो सकती है।
बरसीम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी खेती एक बार करने पर पूरे सर्दी के मौसम में 4 से 8 बार कटाई की जा सकती है। इसकी खेती से पशुपालकों को न केवल लंबे समय तक हरा चारा मिलता है, बल्कि यह अन्य चारे की तुलना में अधिक किफायती भी होता है। प्रति बीघा इसकी खेती पर मात्र 700 से 800 रुपये की लागत आती है और यह तीन महीने तक लगातार चारा उपलब्ध कराता है। यह चारा विशेष रूप से उन पशुपालकों के लिए फायदेमंद है, जो अपने पशुओं को बिना किसी महंगे पूरक आहार के पोषण देना चाहते हैं। इसमें भरपूर मात्रा में प्रोटीन, खनिज और विटामिन होते हैं, जिससे दुधारू पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर रहता है और उनकी कार्यक्षमता भी बढ़ती है।
बरसीम की खेती के लिए दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है, क्योंकि यह नमी को बनाए रखती है और जड़ों के विकास में सहायक होती है। इसकी बुवाई अक्टूबर से नवंबर के बीच की जाती है और पहले कटाई के लिए लगभग 50-55 दिनों का समय लगता है। इस फसल को अधिक देखभाल की जरूरत नहीं होती और सही तकनीक अपनाने पर किसान इसे बहुत कम लागत में उगा सकते हैं। इसकी खेती से किसानों को अतिरिक्त आय भी प्राप्त होती है, क्योंकि वे इसे अन्य पशुपालकों को भी बेच सकते हैं।
बरसीम की खेती को अपनाकर उत्तर भारत के पशुपालक और किसान अपनी पशुधन उत्पादकता में सुधार ला सकते हैं। यह न केवल उनके लिए आर्थिक रूप से लाभदायक साबित हो सकता है, बल्कि पशुपालन उद्योग को भी मजबूती प्रदान करता है।
बरसीम (ट्राइफोलियम अलेक्जेंड्रिनम) उत्तर भारत, विशेषकर हिमाचल प्रदेश, पंजाब और हरियाणा के पशुपालकों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण चारा फसल है। यह दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक आहार प्रदान करता है, जिससे उनकी सेहत में सुधार होता है और दूध उत्पादन में वृद्धि होती है।
भूमि और जलवायु: बरसीम की खेती के लिए दोमट तथा भारी दोमट मिट्टी सर्वोत्तम होती है। अम्लीय भूमि इसके लिए उपयुक्त नहीं होती है। इसके पौधे के अच्छे विकास के लिए 25 डिग्री सेल्सियस का तापमान उत्तम रहता है।
बुवाई का समय: उत्तर भारत में इसकी बुवाई अक्टूबर से नवंबर तक की जाती है। पंजाब और हरियाणा में अक्टूबर माह में बुवाई करना उपयुक्त होता है।
बीज की मात्रा और बुवाई विधि: बरसीम की बुवाई के लिए प्रति एकड़ 8 से 10 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। बुवाई से पहले बीजों को राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना चाहिए, जिससे नाइट्रोजन स्थिरीकरण में मदद मिलती है। बुवाई के लिए खेत को समतल करना आवश्यक है। खेत में 5 सेंटीमीटर गहरे पानी में बीजों को समान रूप से छिड़कें और 24 घंटे बाद पानी निकाल दें।
सिंचाई प्रबंधन: पहली सिंचाई हल्की ज़मीनों में 3-5 दिनों में और भारी जमीनों में 6-8 दिनों के बाद करनी चाहिए। सर्दियों में 10-15 दिनों के अंतराल पर और गर्मियों में 8-10 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें।
कटाई और उपज: बुवाई के लगभग 50-55 दिनों बाद पहली कटाई की जा सकती है। इसके बाद हर 25-30 दिनों के अंतराल पर कटाई की जा सकती है। बरसीम की फसल से सर्दियों के मौसम में 4 से 8 कटाई प्राप्त होती हैं।
पशुओं के लिए लाभ: बरसीम का सेवन करने से पशु स्वस्थ रहते हैं, उनकी कार्य क्षमता बढ़ती है और दूध उत्पादन में वृद्धि होती है। इसमें उच्च प्रोटीन सामग्री होती है, जो दुधारू पशुओं के लिए अत्यंत लाभकारी है।
बरसीम की खेती से पशुपालकों को कम लागत में उच्च गुणवत्ता वाला हरा चारा मिलता है, जिससे उनकी आय में वृद्धि होती है और पशुओं का पोषण सुनिश्चित होता है।
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